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मौत से ठन गई।

मौत से ठन गई।  जूझने का मेरा कोई इरादा न था, मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, रास्ता रोक कर खड़ी हो गयी , यु लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गयी। मौत की उम्र क्या? दो पल भी नहीं। ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।   में जी भर जिया, में  मन से मरू, लौट कर आऊंगा , कुछ से क्यों डरु? तू दबे पाव, चोरी छुपे से न आ, सामने वॉर कर फिर मुजे आज़मा। मौत से बेखर ज़िन्दगी का सफर, शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर। बात ऐसी नहीं की कोई गम ही  नहीं, दर्द अपने पराये कुछ कम भी नहीं। प्यार मुझे परयो से इतना मिला, न अपनों से बाकि है कोई गिला   हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये, आधी मे जलाए है बूजते दिए।      आज जगजोड़ता तेज़ तूफान है, नाव भवरो की बाहो मै मेहमान है। देख तूफा का तेवर, तेवरी तन गई।   मौत से थान गई, मौत से थान गई     - परम पूजनीय भारत रत्न पद्मा विभूषित श्री अटल बिहारी वाजपेयी  

आज़ादी अभी अधूरी है।

  पंधरा ऑगस्ट का दिन कहता आज़ादी अभी अधूरी है। सपने सच होना अभी बाकि है, रावी की सपथ ना पूरी है। जिनकी लाशो पर पग धार कर आज़ादी भारत में आई , वे अभ तक है खानाबदोश, गम की काली बदली छाई । कलकत्ते के फूटपाथो  पर जो आंधी पानी सहते है, उनसे पूछो पंधरा अगस्त के बारे मै क्या कहते है।   भूखो को गोली नंगो को हथियार पहनाये जाते है , सूखे कंठो से जेहादी नारे लगवाए जाते है।   लाहौर, कराची, ढाका पर मातम की है काली छाया , पख्तूनो पर गिलगित पर है, गमगीन गुलामी का साया। बस इसी लिए तो कहता हु , आज़ादी अभी अधूरी है, कैसे उल्लास मनाऊ मै , थोड़े दिन की मजबूरी है। दिन दूर नहीं खंडित भारत को पुनः अखंड बनाएंगे , गिलगित से गारो पर्वत तक आज़ादी पर्व मनाएगे। उस सुवर्ण दिवस के लिए आज से कमर कैसे बलिदान करे जो पाया उस में खो न जाये , जो खोया उसका ध्यान करे।        - परम पूजनीय भारत रत्न पद्मा विभूषित श्री अटल बिहारी वाजपेयी  

Zakir Khan Poem

मैं शून्य पे सवार हूं || मैं शून्य पे सवार हूं || बेअदब सा मैं खुमार हूं , अब मुश्किलों से क्या डरूं , मैं खुद कहर हज़ार हूं | मैं शून्य पे सवार हूं || के ऊंच-नीच से परे , मजाल हु आंख में भरे , मैं लड़ पड़ा हूं रात से , मशाल हाथ में लिए | न सूर्य मेरे साथ है , तो क्या नहीं यह बात है , वह शाम को था ढल गया , वह रात से था डर गया , मैं जुगनुओं का यार हूं | मैं शून्य पे सवार हूं || के भावनाएं मर चुकी , संवेदनाए खत्म है | अब दर्द से मैं क्या डरूं , जिंदगी ही जख्म है | मैं बीच रहा की मात हूं , बे चांद रात सिया हूं | मैं काली का सिंगार हूं || मैं शून्य पे सवार हूं || हूं राम का सा तेज मैं , लंकापति सा ज्ञान हूं , किसकी करूं आराधना , सबस जोे मैं महान हूं | ब्रह्मांड का में सार हूं | मैं जलप्रवाह निहाल हूं || मैं शून्य पर सवार हूं || -Zakir Khan